राजनांदगांव-खैरागढ़ बना पक्षियों के लिए हॉटस्पॉट, 296 प्रजातियों की मिली जानकारी, वन विभाग खुश
राजनांदगांव-खैरागढ़ बना पक्षियों के लिए हॉटस्पॉट, 296 प्रजातियों की मिली जानकारी, वन विभाग खुश
छत्तीसगढ़ का खैरागढ़ और राजनांदगांव जिला अब देश के उभरते हुए बर्ड हॉटस्पॉट के रूप में पहचान बना रहा है। लोकल स्तर पर शुरू हुई बर्ड वॉचिंग की तारीफ हो रही है। यहां 296 प्रजातियों के पक्षियों की उपस्थिति को दर्ज किया गया है।
इस बात की जानकारी खुद वनमंडलाधिकारी पंकज राजपूत ने दी है।
क्या कहा अधिकारी ने
खैरागढ़ वनमंडलाधिकारी पंकज राजपूत ने कहा- छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव और खैरागढ़ जिलों को मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण पक्षी आवास क्षेत्रों में से एक के रूप में चिन्हित किया गया है। जहां विभिन्न आवासों में कुल 296 पक्षी प्रजातियों को रिकॉर्ड किया गया है। उन्होंने कहा के पक्षियों के प्रजातियों के बारे में जानकारी 2019 से 2025 के बीच किए गए एक सर्वे के आधार पर मिली है।
उन्होंने बताया कि यहां 296 पक्षी प्रजातियों का रिकॉर्ड किया जिसमें पासेरीफॉर्मीस का प्रभुत्व रहा। जो कुल प्रजातियों का 40 प्रतिशत से अधिक है। जलपक्षियों, शिकारी पक्षियों और वन-आश्रित प्रजातियों की विविधता इस क्षेत्र के अत्यधिक उत्पादक और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाती है। बाघनदी, छिंदारी और खटूटोला जैसी आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। जहां बड़ी संख्या में पक्षियों का जमावड़ा देखा गया।
उन्होंने बताया कि यहां बघनदी और छिंदारी जैसे स्थलों पर लगभग 1500 ब्राह्मणी मैना, 1000 से अधिक स्वैलो और लगभग 2500 प्रवासी बतखों के समूह दर्ज किए गए। इसके साथ ही डोंगरगढ़ धारा रिजर्व जैसे वन क्षेत्र भी वन-आश्रित प्रजातियों और प्रजनन आबादी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण पाए गए। हालांकि बढ़ते मानवजनित दबावों को लेकर चिंता भी व्यक्त की गई है।
- मध्य भारत का प्रमुख पक्षी विविधता हॉटस्पॉट
- राजनांदगांव-खैरागढ़ में पक्षियों की 296 प्रजाति
- अधिकारियों ने कहा- पक्षियों को कई तरह का खतरा
- पक्षियों के बारे में मिली जानकारी से वन विभाग खुश
पक्षियों को खतरा भी
वनमंडलाधिकारी ने कहा कि यहां पक्षियों के लिए खतरा भी बना हुआ है। उन्होंने कहा कि आवास विनाश, घोंसले वाले पेड़ों की कटाई, अवैध शिकार, सड़क दुर्घटनाएं, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग और बिजली लाइनों से करंट लगना जैसे खतरे सामने आए हैं। कुछ मामलों में पेड़ों की कटाई और मानव हस्तक्षेप के कारण घोंसले असफल होने की घटनाएं भी दर्ज की गई हैं।