नक्सल प्रभाव से विकास की ओर बढ़ता अबूझमाड़, जहां हरियाली के बीच छुपी है संघर्ष की कहानी

नक्सल प्रभाव से विकास की ओर बढ़ता अबूझमाड़, जहां हरियाली के बीच छुपी है संघर्ष की कहानी

नक्सल प्रभाव से विकास की ओर बढ़ता अबूझमाड़, जहां हरियाली के बीच छुपी है संघर्ष की कहानी

अबूझमाड़ का इतिहास केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास, आदिवासी जीवन और नक्सलवाद के जटिल संघर्ष का प्रतीक माना जाता है. यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में लगभग 3900 वर्ग किलोमीटर में फैला घना वन क्षेत्र है, जो लंबे समय तक दुर्गम और लगभग संपर्कविहीन रहा.

1970 के दशक के अंत में माओवादी संगठनों की कुछ टीमें बस्तर और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली क्षेत्र में सक्रिय हुईं. इस दौरान नक्सल नेतृत्व ने ऐसे घने जंगल की तलाश शुरू की, जहां सुरक्षा बलों की पहुंच कठिन हो और जिसे रणनीतिक ठिकाने के रूप में विकसित किया जा सके. इसी क्रम में अबूझमाड़ को एक उपयुक्त क्षेत्र के रूप में चुना गया.

माओवादी विचारधारा के प्रमुख नेता और संगठनात्मक ढांचे से जुड़े कुछ नेताओं ने इस क्षेत्र को अपने विस्तार और रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना है. उनका उद्देश्य एक ऐसे सुरक्षित क्षेत्र का निर्माण करना था, जहां से वे अपने प्रभाव को व्यापक रूप से फैलाने की योजना बना सकें.

अबूझमाड़ का ज्यादातर हिस्सा जंगलों से घिरा
अबूझमाड़ का अधिकांश हिस्सा घने जंगलों से घिरा है और यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के नारायणपुर, बीजापुर और आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के जंगलों से जुड़ा हुआ है. दुर्गमता के कारण लंबे समय तक यहां प्रशासनिक पहुंच बेहद सीमित रही.