बस्तर से सरगुजा तक सैकड़ों गाँवों में गिनती के बचे हिंदू: जानिए छत्तीसगढ़ में डेमोग्राफी बदलने के लिए कहाँ से आ रहा पैसा, कौन भेज रहा

बस्तर से सरगुजा तक सैकड़ों गाँवों में गिनती के बचे हिंदू: जानिए छत्तीसगढ़ में डेमोग्राफी बदलने के लिए कहाँ से आ रहा पैसा, कौन भेज रहा

बस्तर से सरगुजा तक सैकड़ों गाँवों में गिनती के बचे हिंदू: जानिए छत्तीसगढ़ में डेमोग्राफी बदलने के लिए कहाँ से आ रहा पैसा, कौन भेज रहा

छत्तीसगढ़ में जनजातीय जिलों की स्थिति बताती है, कि सैकड़ों गाँवों में एक भी मंदिर नहीं बचा है, लेकिन हर गाँव में 3-4 चर्च दिखाई देने लगे हैं।

छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाकों से धर्मांतरण को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली और विस्तृत जानकारी सामने आई है।

जानकारी के अनुसार, राज्य के जशपुर, बस्तर और अंबिकापुर जैसे क्षेत्रों में धर्मांतरण की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अब यहाँ कई गाँवों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच में यह भी पता चला है कि इस पूरे खेल के पीछे अमेरिका से आने वाली करोड़ों रुपए की विदेशी फंडिंग काम कर रही है। मिशनरीज ने सेवा के नाम पर अपना नेटवर्क इतना फैला लिया है कि अब आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपराएँ भी बदलने लगी हैं।

गाँव के गाँव ने बदला धर्म: मंदिर गायब, चर्च की भरमार

छत्तीसगढ़ के जनजातीय जिलों जैसे जशपुर, अंबिकापुर और रायगढ़ में स्थिति बहुत बदल चुकी है। मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि यहाँ के सैकड़ों गाँवों में अब एक भी मंदिर नहीं बचा है, जबकि हर गाँव में 3 से 4 चर्च का होना एक सामान्य बात हो गई है।

जशपुर जिला तो लंबे समय से इन गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ के गाँवों में अब लोग अपनी परंपरा के उलट शवों को जला नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें दफना रहे हैं। इन कब्रों पर अब हिंदू प्रतीकों की जगह क्रॉस के निशान बने हुए दिखाई देते हैं। जनजातीयों की संस्कृति धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है और उनकी जगह ईसाई रीतियों ने ले ली है।

मिशनरी के निशाने पर कौन? उरांव के बाद अब अन्य जनजातियाँ

मिशनरीज ने बहुत सोच-समझकर अपनी रणनीति बनाई है। उनका मुख्य निशाना समाज के वे लोग हैं जो गरीब हैं, बीमार हैं या खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं। पहले उनका ध्यान ‘उरांव’ जनजाति पर था, लेकिन अब उन्होंने मांझी, भुईंया और पहाड़ी कोरवा जैसी जनजातियों को भी अपने दायरे में ले लिया है।

इन लोगों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता, इसलिए मिशनरी इनके दुख-तकलीफ में खड़े होने का नाटक करते हैं। वे गाँवों में स्कूल खोल रहे हैं और मुफ्त इलाज का लालच देकर लोगों को अपने धर्म की ओर खींच रहे हैं। गाँवों में तैनात पादरी लोगों की मदद करने के बहाने उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

75 प्रतिशत ईसाई, हिंदू अल्पसंख्यक

अंबिकापुर के पास सलाईनगर गाँव की स्थिति बहुत डराने वाली है। यह गाँव तीन हिस्सों में बँटा है, जिसमें से दो बस्तियाँ पूरी तरह ईसाई हो चुकी हैं और केवल बीच की बस्ती में कुछ हिंदू बचे हैं। गाँव के 75 प्रतिशत लोग ईसाई बन चुके हैं। यहाँ 4 चर्च हैं पर एक भी मंदिर नहीं।

इसी तरह भैंसाखार गाँव में अब केवल एक ही हिंदू परिवार बचा है। रायगढ़ के नौनयजोर गाँव में तो स्थिति और भी अलग है। यहाँ के सभी 250 परिवार ईसाई बन चुके हैं। गाँव के हर घर पर सफेद झंडे लगे हैं जिन पर क्रॉस का निशान है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब यहाँ कोई हिंदू परिवार नहीं रहता।

प्रार्थना सभाओं और ‘चंगाई’ का खेल

बेलजौरा गाँव की कहानी भी ऐसी ही है। यहाँ 60 प्रतिशत लोग धर्मांतरित हो चुके हैं। लोग बताते हैं कि जब घर में कोई बीमार होता है, तो पादरी उनके घर पहुँच जाते हैं और प्रार्थना करने लगते हैं। इसे ‘चंगाई सभा’ कहा जाता है।

धर्म परिवर्तन के बाद सबसे पहले घर से हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ और तस्वीरें हटवाई जाती हैं। घर का तथाकथित ‘शुद्धिकरण’ किया जाता है और नाम न बदलने की शर्त पर उन्हें ईसाई बना दिया जाता है। मिशनरीज का मुख्य निशाना महिलाएँ हैं, जिन्हें बहला-फुसलाकर प्रार्थना सभाओं में लाया जाता है।

अमेरिका से छत्तीसगढ़ तक: करोड़ों की विदेशी फंडिंग का खुलासा

धर्मांतरण का यह खेल केवल स्थानीय स्तर पर नहीं चल रहा है, बल्कि इसके तार सात समंदर पार अमेरिका से जुड़े हैं। जाँच में ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ (TTI) नामक एक अमेरिकी संगठन का नाम सामने आया है। इस संगठन की वेबसाइट भारत में प्रतिबंधित है। यह संस्था दुनिया भर से फंड जुटाती है और भारत में प्रति चर्च हर महीने लगभग 3,205 रुपए भेजती है।

इनका एकमात्र उद्देश्य ‘हर गाँव में एक चर्च’ बनाना है। ED की जाँच में पता चला है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच करीब 95 करोड़ रुपए विदेशी डेबिट कार्ड के जरिए भारत लाए गए। इसमें से 6.5 करोड़ रुपए केवल छत्तीसगढ़ के बस्तर और धमतरी जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में खर्च किए गए।

ED की बड़ी कार्रवाई: 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस मामले में कार्रवाई की है। जाँच के दौरान माइक मार्क नामक व्यक्ति के पास से 24 विदेशी डेबिट कार्ड मिले हैं। उसे बेंगलुरु एयरपोर्ट पर पकड़ा गया था। इन कार्डों का इस्तेमाल छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों में ATM से कैश निकालने के लिए किया जा रहा था।

ED का मानना है कि यह एक संगठित नेटवर्क है जो देश की सुरक्षा और वित्तीय व्यवस्था के लिए बड़ा खतरा है। राजनाँदगाँव जिले में गिरफ्तार पादरी डेविड चाको भी इसी अमेरिकी संगठन से जुड़ा था। वह राज्य भर में ‘स्लीपर सेल’ तैयार कर रहा था, जो लोगों को धर्मांतरण का प्रशिक्षण देते थे।

बस्तर में बदलता स्वरूप: देवगुड़ी की जगह पक्के चर्च

बस्तर के जंगलों और गाँवों में एक बहुत गहरा बदलाव दिख रहा है। जहाँ पहले जनजातीय संस्कृति का प्रतीक ‘देवगुड़ी’ (पूजा स्थल) हुआ करती थी, वहाँ अब सुसज्जित और पक्के चर्च खड़े हो गए हैं।

कच्चे घरों वाले गाँवों के बीच ये पक्के चर्च इस बात का सबूत हैं कि विदेशी पैसा कहाँ खर्च हो रहा है। पिछले 10 से 15 सालों में बस्तर में 3,000 से अधिक चर्च बन चुके हैं। करंजी और मोरठपाल जैसे गाँवों में पुराने आदिवासी पूजा स्थलों की सामाजिक भूमिका अब खत्म सी हो गई है और सड़क किनारे बने चर्च गाँवों की नई पहचान बन गए हैं।

सामाजिक तनाव और संस्कृति को बचाने की जंग

धर्मांतरण की इस रफ्तार ने गाँवों को दो हिस्सों में बाँट दिया है। जो लोग ईसाई बन चुके हैं, वे अब अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों और देवगुड़ी में नहीं जाते। इससे गाँवों में आपसी टकराव बढ़ गया है।

जनजातीय समाज के नेता राजाराम तोड़ेम का कहना है कि यह बस्तर की संस्कृति को खत्म करने की एक बड़ी साजिश है। हालाँकि, अब कुछ वर्षों से जनजातीय समुदाय अपनी संस्कृति को बचाने के लिए जागरूक भी हुआ है। जशपुर में हाल ही में रामकथा और जागरण कार्यक्रमों के जरिए लगभग 1,200 परिवारों ने वापस अपने मूल धर्म में वापसी की है।

सरकार का कड़ा रुख: नया कानून और सख्त जाँच

छत्तीसगढ़ सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ पेश किया है। इस कानून का उद्देश्य बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्मांतरण पर कड़ी रोक लगाना है। भाजपा नेताओं का कहना है कि ED की जाँच ने साफ कर दिया है कि विदेशी फंडिंग के जरिए देश विरोधी गतिविधियाँ चलाई जा रही थीं। पुलिस अब चंगाई सभाओं पर भी नजर रख रही है।

छत्तीसगढ़ के जनजातीय अंचलों में धर्मांतरण एक गंभीर चुनौती बन चुका है। एक तरफ सेवा और चंगाई के नाम पर लोगों की आस्था बदली जा रही है, तो दूसरी तरफ विदेशी फंड की मदद से पक्के चर्चों का जाल बिछाया जा रहा है। यह केवल धर्म परिवर्तन का मामला नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की प्राचीन जनजातीय संस्कृति और देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुका है